एमवे

आम को अमीर बनाए एमवे

 

एमवे यानी ‘अमेरिकन-वे’, एक ऐसी एफएमसीजी-मार्केटिंग कंपनी है जो अपनी रणनीतियों के लिए विख्यात है। आज से ठीक 50 साल पहले जनमी एमवे ने 100 से ज्यादा देशों के 30 लाख से ज्यादा सामान्य लोगों को असामान्य व संपन्न कारोबारी बना दिया है। सामान्य कंपनियों से अलग यह कंपनी खास तरीकों से अपने से जुड़नेवाले सामान्य लोगों को डायमंड के रूप तराश देती है।

Amway is an abbreviation for ”American Way”. It’s  blue typeset logo with a pink baseline indicates it’s straight way of quality & faithful business. Amway is a trusted resource for quality home, wellness, and body & beauty products available worldwide through its network of IBOs. The Amway Opportunity is accepted across many cultures as a legitimate path to learning the power of the free enterprise system. Millions of people in the Americas, Australasia, Greater China, Europe, Japan and Korea use the sales and marketing plan to start a business and earn extra income.

इसकी शुरुआत कैसे हुई, यह जानने से पहले हम रूबरू होते हैं इसके संस्थापक जै वान एंडेल और रिचर्ड एम डेवोस से। मिशिगन, अमेरिका की ग्रैंड रैपिड्स में सन 1924 में जनमे जै रिचर्ड डेवोस से दो साल बड़े थे। दोनों की दोस्ती मिशिगन के एक क्रिश्चियन स्कूल में हुई। इस दोस्ती के पीछे एक छोटी सी डील थी, जिसमें रिचर्ड 25 सेंट (डॉलर का एक-चौथाई हिस्सा) पर जै वान को स्कूल तक अपने वाहन में लिफ्ट देते थे। इस ‘डील’ से हुई दोस्ती इतनी पनपी कि उसनें दुनिया को एमवे जैसी कंपनी दी और लाखों लोगों को उद्यमिता का नया सबक भी सिखाया। इन दोनों के विचार और संस्कार इसलिए भी मिलते थे, क्योंकि दोनों के परिवारों की जड़ें चलैंड (हॉलैंड) में थीं। दोनों पूर्वज अपने मेहनती स्वभाव और उद्यमिता के लिए जाने जाते थे। आगे चलकर दोनों सेना में बतौर पायलट भरती हुए और दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका के लिए लड़े ।

युद्ध से लौटने के बाद भी उनकी दोस्ती सलामत रही और उन्होंने जीवन निर्वाह के लिए वॉल्वेरिन एयर सर्विस शुरू की जहाँ वे लोगों को विमान उड़ाना सिखाते थे । इस काम में कुछ ज्यादा सफलता नहीं मिली। बाद में दोनों ने हैंबर्गर के कारोबार में भी हाथ आजमाया । यहाँ भी मनचाहे परिणाम नहीं मिले तो दोनों ने एक जहाज खरीदा और लैटिन अमेरिका में व्यापार संभावनाएँ ढूँढ़ने निकल पड़े। किस्मत ने यहाँ भी साथ नहीं दिया और उनका जहाज कैरेबियन सागर में डूब गया। जै और रिचर्ड के अगले 6 महीने दक्षिण अमेरिका मे गुजरे क्योंकि सब कुछ डूब जाने के बाद उनके पास एकमात्र यही विकल्प बाकी था। मिशिगन लौटने के बाद इन दोनों साहसी युवाओं ने जै-री कॉर्पोरेशन नाम से एक कंपनी बनाई और अपनी समुद्री यात्रा को भुनाते हुए कैरेबियन द्वीपों के आदिवासियों द्वारा बनाई हस्तकला से बनाई चीजें अमेरिका में बेचने लगे।

1949 में एक दिन जै का दूर के रिश्ते का एक भाई शिकागो से एक बिजनेस ऑफर लेकर आया। यह ऑफर कैलिफोर्निया निवासी डॉ. कार्ल रेनबॉर्ग की न्यूट्रीलाइट नामक कंपनी के मल्टीविटामिन प्रॉडक्ट की डिस्ट्रिब्यूटरशिप थी। काफी विचार-विमर्श के बाद 2 अगस्त, 1949 की सुबह के 2 बजे जै और रिचर्ड ने एक साथ न्यूट्रीलाइट का डिस्ट्रिब्यूटर बनने के लिए जरूरी कागजात पर दस्तखत कर दिए। हालाँकि उन्हें सम्मान के साथ डिस्ट्रिब्यूटरशिप और मुनाफे के अच्छे अधिकार मिले थे, फिर भी अभी तक उन्हें समझ नहीं आया था कि उन्हें असल में करना क्या है और वे किस तरह के डिस्ट्रिब्यूटर बने हैं। अगले दिन उन्होंने अपने मल्टीविटामिन प्रॉडक्ट का पहला डिब्बा 19.50 डॉलर में बेच दिया, पर इसके बाद दो हफ्ते तक वे कुछ भी नहीं बेच सके। जै ने अपने उसी चचेरे भाई से मशविरा किया तो उसने कहा कि शिकागो आओ, यहाँ तुम्हें कुछ लोग इस कारोबार के गुर सिखाएँगे। जै और रिचर्ड शिकागो पहुँचे, जहाँ एक होटल में 100 से ज्यादा लोग एक मीटिंग में बैठे मार्केटिंग रणनीति सीख रहे थे। वहाँ ली माइटिंगर नाम के एक मशहूर मार्केटिंग गुरु का उन्होंने भाषण सुना और न्यूट्रीलाइट कंपनी पर बनी एक फिल्म देखी। वे वहाँ मौजूद अन्य डिस्ट्रिब्यूटर्स से भी मिले और उनके साथ अपने अनुभव बाँटे। मीटिंग के समापन पर उनका ब्रेन-वाश हो चुका था और वे दोनों एक नई ऊर्जा से लबरेज थे। वे आतुर थे कि जल्दी-से-जल्दी, ज्यादा-से-ज्यादा प्रॉडक्ट बेचें, अपने नए डिस्ट्रिब्यूटर बनाएँ और कम काम करके ज्यादा मुनाफा बनाएँ। इसका प्रमाण यह है कि मिशिगन वापसी में जब वे एक गैस स्टेशन पर रुके तो वहाँ उन्होंने एक परिवार को न्यूट्रीलाइट सप्लीमेंट का दूसरा डिब्बा बेच डाला।

1959 तक करीब दस साल तक न्यूट्रीलाइट से जुड़े रहने के बाद उन्हें लगने लगा कि सरकार की प्रतिबंधित नीतियों और कंपनी में उभरते विवाद के कारण उनकी योग्यता और मेहनत के साथ पूरा न्याय नहीं हो पा रहा है। कुछ अन्य न्यूट्रीलाइट डिस्ट्रीब्यूटरों की भी यही राय थी। सबक लेते हुए जै और रिचर्ड ने हौसला और पूँजी जुटाकर अप्रैल 1959 में दि अमेरिकन-वे एसोसिएशन नामक एक डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी की स्थापना की, जो चार साल बाद एमवे डिस्ट्रिब्यूशन एसोसिएशन के नाम से जानी गई। इसकी स्थापना का उद्देश्य थाङ्तउद्यमशीलता को बढ़ावा देना, वित्त प्रबंधन को समझना और अपने एसोसिएट्स यानी डिस्ट्रिब्यूटरों को आर्थिक स्वतंत्रता देना।

एमवे का पहला प्रॉडक्ट एल.ओ.सी. नामक एक लिक्विड ऑर्गनिक क्लीनर था, जिसकी उन दिनों बहुत माँग थी। सितंबर 1959 तक कंपनी का ऑफिस खुल गया, जो कि किसी महँगी जगह में न होकर इसके संस्थापक जै के घर के बेसमेंट में था। कारोबार में जै वान और रिचर्ड डेवोस बराबरी के साझीदार थे। जै वान ने नए प्रॉडक्ट और उनके प्रचार-प्रसार का जिम्मा सँभाला और रिचर्ड ने नए-नए डिस्ट्रिब्यूटर्स बनाने का मिशन शुरू किया। काम को सँभालने के लिए उन्होंने 5 कर्मचारी भी नियुक्त कर लिये थे। इसके अलावा दोनों की पत्नियाँ भी काम में हाथ बँटाने लगी थी। कुल मिलाकर एक बेहतरीन टीम वर्क और विजन के साथ एमवे ने शुरुआत की। दो ही साल में कंपनी की सालाना बिक्री बढ़कर 5 लाख डॉलर हो गई और पाँच साल में एमवे 10 लाख डॉलर के टर्नओवरवाली कंपनी बन गई। कंपनी की आकर्षक बोनस पॉलिसी और मार्केट क्रेडिट के कारण हर महीने सैकड़ों की संख्या में नए डिस्ट्रिब्यूटर और दर्जनों अच्छे प्रॉडक्ट उसके साथ जुड़ते जा रहे थे। कंपनी इतनी तेजी से आगे बढ़ रह थी कि इसके संस्थापक हैरान थे। उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि साझेदारी का एक आइडिया इतना कारगर हो सकता है।

एमवे कंपनी के इतिहास पर लिखी गई किताब ‘कमिटमेंट टू एक्सीलेंस द रिमार्केबल एमवे स्टोरी’ में इसके एक संस्थापक रिचर्ड डेवोस ने लिखा हैङ्त‘जितने समय में हम नए लोगों को तैयार करते उतने में प्रॉडक्ट ऑर्डर का अंबार लग जाता। यह बहुत अच्छे संकेत थे, लेकिन बहुत चुनौती भरे।’ इसके लिए कॉर्पोरेट ढाँचा अपनाया गया और वैसी ही रणनीतियाँ भी बनाई गईं। 1964 में एमवे सेल्स कॉर्पोरेशन, एमवे सर्विस कॉर्पोरेशन और एमवे मैन्यूफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन का एक कंपनी में विलय हो गया। इसी बीच कंपनी पर गलत बिजनेस नीतियों के जरिए कारोबार फैलाने का आरोप भी लगा, लेकिन जाँच के बाद अमेरिकी सरकार ने एमवे को बेदाग बताया।

अपनी स्थापना का एक दशक पूरा करते-करते एमवे पूरे अमेरिका में फैल गई, अब इसके संचालकों की नजर बाकी दुनिया पर थी, यह भी सच्चाई थी कि जिन उत्पादों के दम पर एमवे आगे बढ़ रही थी, उनमें ज्यादातर ऐसे थे जो कि संपन्न और विकसित देशों के लोग ही इस्तेमाल कर सकते थे या करते थे। अभी एमवे के लिए लगभग आधी गरीब दुनिया एजेंडा में नहीं थी। ’70 के इस दशक के शुरू में ही कंपनी ने सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया की ओर कदम बढ़ाए। इसके बाद 1973 में यूरोप और एशिया के धनी देशों की ओर रुख किया। एमवे ने 1985 में लैटिन अमेरिका, 1995 में चीन, 1997 में अफ्रीका और 1998 में भारत में दस्तक दी। नए उत्पादों को अपने बुके में जोड़ने के लिए कंपनी ने 1972 में उसी न्यूट्रीलाइट कंपनी पर नियंत्रण कर लिया जिससे इसके संस्थापकों ने मार्केटिंग के गुर सीखे थे। एमवे ने 1994 में न्यूट्रीलाइट के स्वामित्व अधिकार पूरी तरह से खरीद लिया। ’80 के दशक तक एमवे एक अरब डॉलर सालाना के कारोबार के साथ एक स्थापित एफ.एम.सी.जी. कंपनी बन चुकी थी साथ-ही-साथ वह विश्व समुदाय के लिए अपनी कॉर्पोरेट जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही थी।

सदी के अंत तक कंपनी को नए कर्ताधार मिले जै और रिचर्ड डेवोस के बेटे। दूसरी पीढ़ी के चेयरमैन स्टीव वान एंडेल और अध्यक्ष डिक डेवोस भी उन पारिवारिक मूल्यों का निर्वहन कर रहे थे, जिसकी नींव इसके संस्थापकों ने रखी थी। इसी तरह डिस्ट्रिब्यूटर्स भी एमवे से अपने रिश्ते को दूसरी पीढ़ी तक ले गए थे । पर्यावरण जागरूकता और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए एमवे को 1989 में यूनाइटेड नेशंस ने सम्मानित भी किया है।

कॉर्पोरेट संरचना के पुनर्गठन के लिए 1999 में कंपनी ने एलिटकोर के रूप में एक नई होल्डिंग कंपनी बनाई और तीन नई कंपनियाँङ्तक्विकस्टार, एक्सेस बिजनेस ग्रुप और पिक्सिस इनोवेशंस स्थापित की, जिनके तहत अमेरिका व यूरोपीय देशों में एमवे के इलेक्ट्रॉनिक व इंटरनेट आधारित कारोबार को संगठित किया गया। हालाँकि बाकी दुनिया में एमवे ही सक्रिय रही। 2008 तक कंपनी 6 अरब डॉलर सालाना का कारोबार करनेवाली कंपनी बन चुकी थी।

भारत में पर्सनल केअर, होम केअर, न्यूट्रीशन-वेलनेस और कॉस्मेटिक कैटेगरी के करीब 105 उत्पादों के साथ 1998 से सक्रिय एमवे देश की सबसे बड़ी डायरेक्ट सेलिंग एफ.एम.सी.जी. कंपनी बन गई। कंपनी का सालाना टर्नओवर 1,000 करोड़ को पार कर गया। आज पूरे देश में कंपनी के साढ़े चार लाख से ज्यादा एक्टिव डिस्ट्रिब्यूटर्स या इंडिपेंडेंट बिजनेस ऑनर्स हैं। अपने डिस्ट्रिब्यूटर्स को प्रशिक्षण देने के लिए एमवे विशेष ट्रेनिंग सेशन आयोजित करती है। ये सेशन ही इसकी मार्केटिंग रणनीति की ‘बैकबोन’ हैं। इनमें भाग लेनेवाले लोगों को विशेष प्रचार सामग्री व ऑडियो-वीडियो तरीके से प्रोत्साहित कर एमवे परिवार में जोड़ लिया जाता है। एक आकलन के अनुसार कंपनी ने पिछले साल में 29 हजार से ज्यादा ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए, जिनमें 15 लाख लोगों ने भाग लिया।

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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