डोमिनोजः खुशियों की होम डिलीवरी

Dominoz

पिज्जा, मतलब नई पीढ़ी का सबसे पसंदीदा फास्ट फूड। एक ऐसा पका-पकाया तैयार खाना जो, भरे पेटवालों को भी अपने रंग-रूप और सुगंध से ललचाता है। पर, क्या आप यकीन करेंगे कि यही पिज्जा कभी इटली के गरीबों की रोटी हुआ करता था? आज के आँकड़े देखें तो लगभग दुनिया की कुल आबादी से ज्यादा पिज्जा दुनिया भर में हर साल खाए जाते हैं।

Founded in 1960, Domino’s is the second-largest pizza chain in the United States. Domino’s currently has nearly 9,000 corporate and franchised stores in 60 international markets. Domino’s introduced its corporate logo, a red domino flush against two blue rectangles, in 1975. The company was sued by Amstar Corporation, parent company of Domino Sugar, for the right to use the name. After a five-year battle, Domino’s won, but not until after more than 30 new stores were opened under the interim name Pizza Dispatch. In the year 1997, the company developed their new logo and the image was brightened up.

इटली से शुरू हुई पिज्जा की कहानी आज पूरी दुनिया दोहरा रही है। अमेरिका में तो पिज्जा नंबर वन फास्ट फूड है। ताजा संदर्भ में बात करें तो बिना पिज्जा और कोक के अमेरिका वासियों को दिन अधूरा लगता है। पिज्जा को पसंद और लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचानेवाली कंपनियों में अमेरिकी कंपनी डोमिनोज का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। हालाँकि बाजार और खपत के आँकड़ों के हिसाब से डोमिनोज का कद ‘पिज्जा हट’ से छोटा है, पर इस कंपनी के साथ जुड़ा इसका इतिहास इसे सबसे खास बना देता है। डोमिनोज की ब्रांड हिस्ट्री टॉम मोनेघन नामक एक ऐसे उद्यमी की संघर्ष कहानी है, जो प्रेरणा देती है कि मेहनत करके महान् बना जा सकता है। 1937 में मिशिगन के पास एन आर्बर में पैदा हुए टॉम के सिर से पिता का साया मात्र चार साल की उम्र में उठ गया था। लाचार व गरीब माँ ने बहुत कोशिश की, लेकिन रोटी और मकान एक साथ नहीं जुटा पाई। नतीजतन टॉम और उसके छोटे भाई जिम का बचपन अनाथालयों में गुजरा। टॉम को ज़िंदगी ने संघर्ष का सबक बचपन में ही सिखा दिया था। वह 12 साल की उम्र में ही काम-धंधे की जुगत में लग गए, ताकि परिवार का अस्तित्व बचाया जा सके। उन्होंने खेतिहर मजदूर से लेकर चपरासी तक के ढेरों मेहनत भरे काम करके खुद को भविष्य के लिए तैयार किया। अतीत की यादों में गोता लगाते हुए एक बार उन्होंने कहा था, मैं अच्छा जीवन पाने की जी-तोड़ कोशिश करता हूँ, पर मुझे नतीजे खराब मिलते हैं। फिर भी मुझे आशा है, मैं कुछ बड़ा कर जाऊँगा।

रिश्तेदारों की मदद से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद टॉम ने कॉलेज की पढ़ाई के लिए कड़ी मेहनतवाली नौकरियाँ करके जैसे-तैसे 2,000 डॉलर जमा किए, लेकिन एक दोस्त ने उन्हें धोखा दिया। वह उनकी सारी बचत लेकर भाग गया। खाली हाथ हताश टॉम अपने भाई जिम के पास लौट आए, जो कि डोमिनिक्स नाम की एक पिज्जा शॉप के लिए पार्ट टाइम कारपेंटर का काम करता था। एक दिन जिम ने डोमिनिक्स के मालिक से सुना कि वह घाटे में चल रही उस दुकान को बेच देगा। उसने टॉम को यह बात बताई, जो कोई नया काम करने के लिए बेसब्र था। दोनों भाइयों ने विचार किया और इस कारोबार में सफलता की संभावनाएँ सूँघी। पैसों का संकट पोस्ट ऑफिस से मिले 900 डॉलर के कर्ज से हल हो गया। थोड़ी सौदेबाजी के बाद डोमिनिक्स का मालिक मान गया और दिसंबर 1960 में मोनेघन बंधु इपसिलांटी, मिशिगन में एक छोटी सी दुकान के मालिक हो गए।

इस स्टोर पर तरह-तरह के पिज्जा के अलावा सैंडविचेज, बर्गर, कोला जैसी चीजें मिलती थीं। ग्राहकों के बैठने के लिए थोड़ी सी जगह थी और होम डिलीवरी न के बराबर थी। इधर, नए मालिक अनुभवहीन थे; पर चाहे जो हो, वे कमाई करना चाहते थे। उन्होंने सबसे पहले स्टोर के मीनू को ठीक किया। दाम घटाए और खुद पिज्जा बनाना सीखा। मुफ्त होम डिलीवरी की सुविधा भी शुरू की। इन सब संकट-निवारण उपायों के चलते शॉप चल निकली और छह महीने में ही वे कर्ज-मुक्त हो गए और साल भर में मुनाफा कमाने लगे। दोनों भाइयों ने सुविधा के लिए एक पुरानी वॉल्क्सवेगन बीटेल कार भी खरीद ली। टॉम तो नए कारोबार में रम गया, पर जिम का मन नहीं लगा। कुछ ही महीनों में उसने कारोबार से अलग होने का इरादा जाहिर किया और केवल बीटेल कार के बदले अपनी साझेदारी बेच दी। अब पूरे स्टोर पर टॉम का कब्जा हो गया। वह मेहनती था और प्रबंधन के गुर भी सीख रहा था। जल्दी ही डोमिनिक्स की बिक्री बढ़ने लगी और पुरानी दुकान छोटी पड़ने लगी। टॉम ने सड़क के दूसरी ओर एक बड़ा स्टोर खरीदने का फैसला किया। उन्होंने डिलीवरी के लिए एक ड्राइवर भी नियुक्त किया। यह पहला विस्तार शुभ रहा। पहले हफ्ते में बिक्री 99 डॉलर से बढ़कर 750 डॉलर तक जा पहुँची। पिज्जा कारोबार को और समझते हुए टॉम ने अपने मीनू कार्ड से उन सभी आइटमों को निकाल दिया, जिन्हें बनाने में ज्यादा समय, सामान और मेहनत लगती थी। इससे मीनू एकदम सादा हो गया और कर्मचारी भी खुश हो गए, क्योंकि उन्हें केवल रेगुलर पिज्जा ही बनाना होता था। ‘सिंपल मीनू- मल्टीपल गेन’ का यह फंडा आज भी हिट है। गेन’ का यह फंडा आज भी हिट है।

पिज्जा कारोबार में भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए टॉम ने एक स्थानीय शेफ जिम गिलमोर के साथ साझेदारी में दो नए स्टोर खोलने का फैसला किया। उन्होंने ‘पिज्जा किंग’ के नाम से नए स्टोर खोले। कुछ समय तो ठीक चला, पर बाद में गिलमोर के बीमार और दिवालिया होने के कारण आमदनी गिरने लगी। आखिरकार दो साल बाद 1964 में दोनों ने साझेदारी खत्म कर ली। बाद में टॉम ने गिलमोर को हर्जाना देकर उसके  पिज्जा स्टोर भी खरीद लिये। अब टॉम के पास चार पिज्जा स्टोर हो गए थे। इसी बीच डोमिनिक्स के असली मालिक के मन में लालच आया और उसने ब्रांड नेम पर अपना अधिकार जताया। समस्या का समाधान खोजा मोनेघन के एक ड्राइवर जिम केनेडी ने और ‘डोमिनोज पिज्जा’ नाम सुझाया। यह नाम पुराने से मिलता-जुलता था, इसलिए सभी को पसंद आया। नए ब्रांड नेम के साथ मोनेघन ने पिज्जा कारोबार को कॉर्पोरेट कंपनी का रूप देने का दूरगामी फैसला करते हुए वर्ष 1965 में ‘डोमिनोज़ पिज्जा’ की नींव रखी। निदेशक मंडल का गठन किया गया जिसमें टॉम, उनकी पत्नी और दो अन्य सहयोगियों को शामिल किया गया। नई फ्रेंचाइजीस और लीज़ पर स्टोर देने की रणनीति बनाई गई। मुनाफे का बँटवारा रॉयल्टी के आधार पर करने का निर्णय लिया गया। चूँकि डोमिनाज को मिशिगन राज्य में अच्छी लोकप्रियता हासिल हो चुकी थी, इसलिए फ्रेंचाइजी बिकने में मुश्किलें नहीं आईं। इस बारे में अपनी आत्मकथा ‘पिज्जा टाइगर’ में टॉम ने लिखा हैङ्त‘‘अपने पहले कारोबारी विस्तार में मेरा पूरा ध्यान फ्रेंचाइजी और रॉयल्टी बँटवारे पर था। यह नए उद्यमियों को पसंद आया। 1968 तक मिशिगन और करीबी इलाकों में दस डोमिनोज फ्रेंचाइजीस शुरू हो गईं।’’

सब अच्छा चल रहा था, तभी अचानक फरवरी 1968 में कंपनी के मुख्यालय व गोडाउनवाली मुख्य इमारत में भीषण आग लगी। लगभग सारा कच्चा माल जल गया और 1.5 लाख डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो गया। पिज्जा स्टोर्स की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए टॉम की टीम ने रात-दिन एक करके समय पर माँग पूरी की। बहुत ही मुश्किल हालात में बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रखने से डोमिनोज की साख बढ़ गई। इस अनुभव से उत्साहित और मैकडॉनल्ड की सफलता से प्रेरित होकर मोनेघन ने तेजी से विस्तार की नीति बनाई। उन्होंने बाजार से भारी कर्ज लिया और एक साथ 32 स्टोर्स खोलने तथा 85 कारों की फास्ट डिलीवरी टीम बनाने की घोषणा की। भरपूर प्रचार-प्रसार भी किया गया। मिशिगन और अन्य राज्यों में इसकी चर्चा होने लगी। इसी दौरान कंपनी रिकॉर्ड को कंप्यूटराइज्ड कराने की प्रक्रिया में पूरा रिकॉर्ड नष्ट हो गया। इससे कंपनी को भारी झटका लगा। बिना आँकड़ों के कंपनी अव्यवस्थित हो गई और कर्ज न चुका पाने के कारण कुछ ही महीनों में उन्हें कंपनी को बचाने के लिए अपनी 51 फीसदी हिस्सेदारी डेन क्विर्क नामक एक अन्य कारोबारी को बेचनी पड़ गई। क्विर्क ने अपनी ओर से केन हेवलिन नाम के एक प्रबंधक को नियुक्त किया, जिसने अनुबंध के मुताबिक डोमिनोज से मोनेघन को बेदखल कर दिया। नए मालिक असफल रहे और उन्होंने मोनेघन से मदद माँगी। इधर, एक साल में मोनेघन ने खुद को फिर से तैयार किया और डोमिनोज में अपनी खोई हिस्सेदारी व फ्रेंचाइजी मालिकों का विश्वास फिर से प्राप्त कर लिया। मोनेघन के लौटने से कंपनी के पुराने दिन लौटने लगे।

गलतियों से सबक सीखे मोनेघन ने कुछ भी फिर से न दोहराने का संकल्प लिया। नई टीम बनाई और उसमें उन लोगों को शामिल किया, जिन्होंने संकट के समय मदद की थी। इनमें रिचर्ड मुलेइर, डेव किल्बी, डेव ब्लैक और डिक मुलेइर के नाम सबसे ऊपर थे। इपसिलांटी, मिशिगन में मुख्यालय बनाने के साथ नीतियाँ और रणनीतियाँ फिर से तय की गईं। कॉर्पोरेट कल्चर अपनाने के साथ कंपनी को भविष्य के लिए तैयार किया गया। नतीजे भी अच्छे आए। डोमिनोज घाटे से उबर गई और सालाना 50 फीसदी की दर से विस्तार करने लगी। कंपनी ने विलय और अधिग्रहण नीति पर अमल कर ‘पिज्जाको’ नाम की कंपनी खरीदकर अमेरिका के कंसास, एरिजोना और नेबरस्का में भी पैर जमा लिये। यह वह दौर था जब अमेरिका भी तेजी से विकसित हो रहा था और वहाँ के लोगों की जीवन-शैली बदल रही थी। ऐसे में फास्ट फूड उनके लिए खाने का बेहतर विकल्प बनकर उभरा और पिज्जा ने इस नए मीनू में सबसे ज्यादा जगह घेरी। मैक्डॉनल्ड, पिज्जा हट और डोमिनोज के लिए यह अनुकूल माहौल था, जिसे तीनों ही कंपनियों ने भरपूर भुनाया।

फ्रेंचाइजी और लीज पर स्टोर देने की नीति के चलते डोमिनोज के करीब 300 स्टोर हो गए थे। अब कंपनी की नजर अमेरिकी बाजार के साथ पूरी दुनिया पर थी। तमाम अड़चनों से उबरते हुए डोमिनोज ने 1980 के दशक में तेजी से विस्तार पर जोर दिया। बाजार खुला था और तेजी से बढ़ रहा था, हालाँकि प्रतिस्पर्धा भी तीव्र व तीखी थी। कंपनी मुख्यालय को एन ऑर्बर, मिशिगन ले जाने के बाद डोमिनोज ने अपने कुशल प्रबंधकों को आगे करके पिज्जा आंदोलन को वैश्विक बनाने का फैसला किया। डोमिनोज ने 1983 में कनाडा में विनिंगपेंग में पहला इंटरनेशनल पिज्जा स्टोर शुरू किया। 30 मिनट में डिलीवरी नहीं तो पैसे कम जैसी आक्रामक नीतियाँ अपनाते हुए डोमिनोज ने 1985 तक अपनी कुल शाखाओं की संख्या 2,300 तक बढ़ा ली; पर, वह अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी ‘पिज्जा हट’ की करीब 4,000 शाखाओं से बहुत पीछे थी। कंपनी ने विज्ञापन युद्ध छेड़ा और प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए हर दाँव-पेंच खेला। एडवरटाइजिंग बजट में सालाना 250 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ हर

अच्छे शहरी को पिज्जा खाना सिखाया। इसी दौरान 28 साल में पहली बार अपने मीनू में बदलाव करते हुए डोमिनोज ने ‘पैन पिज्जा’ लॉञ्च किया। 1990 के अंत तक डोमिनोज 5,000 शाखाओं के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी पिज्जा कंपनी बन गई। यह दर्जा आज तक कायम है।

1989 का साल डोमिनोज के लिए बेहद खराब रहा, क्योंकि कंपनी के डिलीवरी वाहनों से 20 से ज्यादा मौतें हुईं। कंपनी पर कई मुकदमे दायर हो गए। एक महिला को टक्कर मारने के मामले में उसे करीब 8 करोड़ डॉलर का भारी हर्जाना भी देना पड़ा। इससे कंपनी की साख बुरी तरह प्रभावित हुई। दूसरी ओर कड़ी प्रतिस्पर्धा और निरंतर विस्तार के दबाव ने कंपनी की वित्तीय स्थिति डावाँडोल कर दी। आखिरकार 1993 में डोमिनोज ने अपनी 30 मिनट डिलीवरी स्कीम को ‘कस्टमर सेटिस्फेक्शन गारंटी स्कीम’ में बदल दिया। इसी दौरान मोनेघन ने डोमिनोज को बेचने का मन बना लिया। करीब 35 साल के कॉर्पोरेट उतार-चढ़ाव देखने के बाद अब वह अपना ज्यादा समय परोपकार के कामों में लगाना चाहते थे। 1998 में उन्होंने बोस्टन की एक इक्विटी फर्म बैन कैपिटल से करीब 1 अरब डॉलर व 5 करोड़ देनदारी के साथ डोमिनोज में अपनी 93 फीसदी हिस्सेदारी बेच दी। हालाँकि उन्होंने वोटिंग का अधिकार अपने पास बनाए रखा। नई कंपनी डोमिनोज इन्कॉर्पोरेशन के नाम से पुनर्गठित की गई। काफी खोजबीन के बाद मशहूर मार्केटिंग मैनेजर डेविड ब्रेंडन को सी.ई.ओ. बनाया गया। ब्रेंडन ने कड़े फैसले लेते हुए उन तमाम शाखाओं और संपत्तियों से हाथ खींच लिए जो मुनाफा नहीं कमा रही थीं। कर्मचारियों की संख्या में भी कटौती की गई तो शेष कर्मचारियों की कुशलता बढ़ाई गई। नए अधिग्रहण व समझौते किए गए तथा विज्ञापन में विश्वसनीयता पर जोर दिया गया। इसी तरह नए आइटम मीनू लिस्ट में शामिल कर, नए ऑफरों के साथ ग्राहकों को संतुष्ट करने के लिए कंपनी ने डिलीवरी को आकर्षक बनाया। 1998 में डोमिनोज ने ‘हीट वेव’ नाम का ऐसा पिज्जा डिलीवरी बैग लॉञ्च किया जिसमें काफी देर तक पिज्जा गरम और कुरकुरा बना रहता है। इन तमाम उपायों के चलते कंपनी फिर से फायदे में आ गई। विस्तार लगातार जारी है। 2006 तक कंपनी की दुनिया के 55 देशों में 8,000 हजार शाखाएँ हो चुकी थीं और अब उसका लक्ष्य दस हजार शाखाएँ पूरी करने का है।

अमेरिका, यूरोप के शहरियों को पिज्जा का स्वाद चखाने के बाद डोमिनोज ने 1995 में भारत में कदम रखा। भारत की शाखा को उद्योगपति श्याम भरतिया (हिंदुस्तान टाइम्स की शोभना भरतिया के पति) जैसे प्रमोटरों ने आगे बढ़ाया। भारत की शाखा नेपाल, श्रीलंका और बँगलादेश के लिए मास्टर शाखा के रूप में स्थापित की गई। देश में पहला डोमिनोज स्टोर 1996 में दिल्ली में खोला गया और अब देश के 42 शहरों में 300 से ज्यादा डोमिनोज शाखाएँ हैं। डोमिनोज ने भारत में अपनी तरह की पहली ‘हैप्पी हॉटलाइन फोन ऑर्डर सेवा’ भी शुरू की है। सी.ई.ओ. अजय कौल के नेतृत्व में नोएडा स्थित कॉर्पोरेट ऑफिस, कोलकाता, बेंगलुरु, दिल्ली के क्षेत्रीय ऑफिसों के सहयोग से ब्रांड भारत में तेजी से स्थापित हो रहा है।

”I always knew I was going to be rich. I don’t think I ever doubted it for a minute.”  -Warren Buffett

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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