माइक्रोसॉफ्ट

झूठ से शुरू हुई थी माइक्रोसॉफ्ट

क्या कोई यकीन कर सकता है कि दुनिया की सबसे अमीर कंपनियों में से एक माइक्रोसॉफ्ट की बुनियाद दो युवाओं के एक झूठ पर रखी गई थी? बिल गेट्स के कुशल नियंत्रण में स्थापना के 33 साल बाद आज माइक्रोसॉफ्ट एक ऐसे आधार पर खड़ी है जिस पर नई सदी की नई इबारत लिखी जा रही है। गर्व का विषय है कि माइक्रोसॉफ्ट की सफलता में भारत की आई.टी. प्रतिभाओं का भी महती योगदान है।

 

The original Microsoft  logo was a ”groovy logo.  The old logo, which was green, in all uppercase, and featured a fanciful letter O, nicknamed the blibbet, but it was discarded. Microsoft ”blibbet” logo, used until 1987. In 1987, Microsoft adopted its current logo, the so-called ”Pacman Logo”. The logo was designed by Scott Baker. According to the March 1987 Computer Reseller News Magazine, ”The new logo, in Helvetica italic typeface, has a slash between the o and s to emphasize the ”soft” part of the name and convey motion and speed.”  Microsoft logo with the 1994-2002 slogan ”Where do you want to go today?”   Microsoft logo as of 2006, with the slogan ”Your potential. Our passion”

 

माइक्रोसॉफ्ट की बुनियाद ः  एक झूठ और दो कमरे

अलबुकुर्क, न्यू मेक्सिको में जनवरी 1975 का एक दिन। एम.आई.टी.एस. नाम की एक तकनीकी कंपनी की बड़ी सी इमारत में दो अजनबी युवक घुसे। संतरी ने रोका और आने का कारण पूछा तो उनमें से एक बोला कि कंपनी के मालिक ने बुलाया है। कुछ ही देर में दोनों कंपनी के प्रमुख के सामने बैठे थे। मालिक थेङ्तएड रॉबर्ट्स और युवकों के नाम थेङ्तबिल गेट्स व पॉल एलन। मुलाकात का मुद्दा था, एम.आई.टी.एस. के बनाए नए माइक्रोकंप्यूटर आल्टेयर 8800 के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम सॉफ्टवेयर बनाने का। बिल और एलन ने कंपनी को बताया कि उन्होंने आल्टेयर को चलानेवाला सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया है और वे उसे बेचना चाहते हैं। एम.आई.टी.एस. के लिए तो यह पतझड़ में बहार आनेवाली स्थिति थी, क्योंकि यह दुनिया का पहला माइक्रोकंप्यूटर था, लेकिन इसे चलानेवाला कोई बेसिक इंटरप्रेटर प्रोग्राम नहीं बन सका था। कंपनी ने सौदा किया और बिल व एलन को 8 हफ्ते का समय मिला कि वे आल्टेयर को अपने प्रोग्राम से चलाने लायक बना दें। असलियत यह थी कि न तो उन्होंने आल्टेयर पर काम किया था और न ही उनके पास ऐसा कोई प्रोग्राम था, लेकिन यह कोरा झूठ आगे चलकर सच में बदला और माइक्रोसॉफ्ट कॉर्पोरेशन की बुनियाद का कारण बना।

आठ हफ्ते में बिल और एलन ने रात-दिन एक करके एक बेसिक प्रोग्राम बना लिया और आल्टेयर को चला भी दिया। बस, यहीं से शुरू होती है माइक्रोसॉफ्ट की कहानी, जो दो कमरों के दफ्तर से शुरू हुई और आज दुनिया के 105 देशों के सैकड़ों आलीशान दफ्तरों से बयाँ हो रही है। ‘माइक्रोसॉफ्ट’ नाम इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका लक्ष्य माइक्रोकंप्यूटर किट के लिए प्रोग्राम बनाना था। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि माइक्रोसॉफ्ट के सर्वेसर्वा संस्थापक हेनरी विलियम गेट्स उर्फ बिल गेट्स स्कूली दिनों में कंप्यूटर हैकिंग के कारण प्रतिबंधित किए गए थे। कंप्यूटर के इतने ही दीवाने बिल ने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की अपनी पढ़ाई भी अधूरी छोड़ दी थी, जिसके कारण आज वे दुनिया के सबसे अमीर नॉन-ग्रेजुएट कहे जाते हैं। भले ही वह आज माइक्रोसॉफ्ट की सक्रिय जिम्मेदारी छोड़ चुके हैं, पर कंपनी के हर नए कदम में उनकी मेहनत, लीडरशिप और दूरदृष्टि दिखाई देती है। बिल ने अपनी बड़ी जिम्मेदारियाँ स्टीव बॉमर, क्रेग मुंडी और रे ओज़ी की टीम को सौंप दी है।

डॉस से बढ़े कदम, विंडोज से विस्टा तक

आल्टेयर के लिए बेसिक प्रोग्राम बनाने के बाद माइक्रोसॉफ्ट के युवा संस्थापकों को एक दिशा मिल गई और उन्होंने पूरा ध्यान पर्सनल कंप्यूटर के लिए सॉफ्टवेयर पर लगाया। माइक्रोसॉफ्ट का काम चल निकला। 1980 के दौर में दुनिया में आई.बी.एम. कंपनी की अगुआई में पी.सी. क्रांति आ रही थी । ऐसे में नए कंप्यूटर को चलाने के लिए ऐसे सरल ऑपरेटिंग सिस्टम की जरूरत थी, जिसे एक्सपर्ट के साथ-साथ एक सामान्य आदमी भी चला सके। आई.बी.एम. ने बिल की कंपनी से संपर्क किया। नई तरकीब भिड़ाते हुए बिल ने उन्हें डिजिटल रिसर्च नाम की कंपनी की सेवाएँ लेने का सुझाव दिया। संभवतः इसके पीछे फिर से उतना समय लेना था, जितने में आई.बी.एम. के लायक प्रोग्राम बन जाए। आई.बी.एम. और डिजिटल रिसर्च के बीच सौदा नहीं हो सका। आई.बी.एम. फिर से बिल की शरण में आई । अब वे तैयार थे। उन्होंने 86-डॉस (क्यू-डॉस) के रूप में नया ऑपरेटिंग सिस्टम पेश किया, जो आगे चलकर एम.एस. डॉस के रूप में मशहूर हुआ। इसे उन्होंने 80 हजार डॉलर में आई.बी.एम. को बेचा, लेकिन कॉपीराइट अपने पास रखे। यह एक शातिर पैंतरा था, जिसने आगे चलकर माइक्रोसॉफ्ट का कायाकल्प कर उसे नंबर वन बना दिया। इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज उतारा, जो ऐसा शानदार सॉफ्टवेयर सिद्ध हुआ कि कंप्यूटर में झाँकने की एकमात्र खिड़की आज तक बना हुआ है। इसके बाद आए विंडोज के चार नए वज़र्नों और विंडोज एक्सपी ऑपरेटिंग सिस्टम ने माइक्रोसॉफ्ट सूचना-क्रांति के युग की लैगशिप कंपनी बन गई। पिछले साल कंपनी ने माइक्रोसॉफ्ट विस्टा नाम का सुविकसित ऑपरेटिंग सिस्टम लॉञ्च किया, लेकिन उसे अपेक्षा से कम रिस्पांस मिला है।

 

इंटरनेट का नीला-इ और 1200 अरबपतियों की कंपनी

माइक्रोसॉफ्ट ने इंटरनेट की क्षमताओं को पिछली सदी में ही भाँप लिया था और अपनी सेवाओं का विस्तार करना शुरू कर दिया था। 1995 में कंपनी ने विंडोज के नए वर्जन के साथ इंटरनेट एक्सप्लोरर जोड़कर पूरी दुनिया को बेतार के तारों से जोड़ने का महाअभियान शुरू किया था। नीले रंग में घूमता अंग्रेजी का वह इ अक्षर इंटरनेट के नाम से दुनिया भर के कंप्यूटरों को आपस में जोड़कर आज ज्ञान व तकनीक का महासागर बन चुका है। आप साधारण समझदारी से इसमें गोते लगाते जाइए, हर बार पहले से ज्यादा बेशकीमती मोती पाइए। इसी तरह कंपनी ने माइक्रोसॉफ्ट मॉउस से कंप्यूटर हार्डवेयर के क्षेत्र में पैठ बनाई है। विंडोज मोबाइल, एक्सबॉक्स वीडियो गेम कंसोल और एमएसएनबीसी टी.वी. नेटवर्क के जरिए भी कंपनी ने अपने प्रॉडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार किया है।

सॉफ्टवेयर कारोबार में मोनोपॉली और दबदबा कायम रखने के लिए माइक्रोसॉफ्ट ने अमेरिकी सरकार और यूरोपियन कमीशन के साथ लंबी कानूनी लड़ाइयाँ लड़ीं। इसके लिए माइक्रोसॉफ्ट को अपनी कारोबारी रणनीतियाँ बदलने के साथ करोड़ों डॉलर का जुर्माना भी भरना पड़ा, पर इसका फायदा भी उन्हें मिला और हर सॉफ्टवेयर की कीमत जमकर वसूल कर बिल गेट्स समेत 4 उद्यमियों को खरबपति और 12,000 से ज्यादा कर्मचारियों को अरबपति बनाने का श्रेय माइक्रोसॉफ्ट को मिले। संभवतः यह दुनिया की पहली व एकमात्र ऐसी कंपनी है, जिसके पास 12 हजार से ज्यादा अरबपति कर्मचारी हैं।

 

माइक्रोसॉफ्ट की प्रतिष्ठा ः  माइक्रोसॉफ्ट इंडिया

आई.टी. युग में भारत को मिली वैश्विक पहचान के पीछे भी माइक्रोसॉफ्ट की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कंपनी ने 1998 में भारत के आई.टी. बाजार में मात्र 20 कर्मचारियों के स्टाफ के साथ दस्तक दी थी । हैदराबाद में कंपनी ने अपना कैंपस माइक्रोसॉफ्ट इंडिया डेवलपमेंट सेंटर यानी एम.एस.आई.डी.सी. बनाया और मात्र दस साल में वह दबदबा कायम किया है कि वह माइक्रोसॉफ्ट प्रतिष्ठा सूची में दूसरे पायदान पर आ गई। पहले पायदान पर रेडमंड, वॉशिंगटन स्थित माइक्रोसॉफ्ट मुख्यालय है। मशहूर आई.टी. प्रोफेशनल श्रिनी कोप्पुलू के नेतृत्व में माइक्रोसॉफ्ट इंडिया का कारोबार तेजी से फैल रहा है। आज कंपनी के पास 1200 से ज्यादा आई.टी. प्रोफेशनल्स की टीम है, जो 50 से ज्यादा प्रॉडक्ट्स बना चुकी है। पिछले तीन साल के दौरान भारत की विलक्षण आई.टी. प्रतिभाओं ने माइक्रोसॉफ्ट के लिए 180 से ज्यादा पेटेंट फाइल किए हैं। माइक्रोसॉफ्ट इंडिया स्टोरेज, नेटवर्किंग और मोबिलिटी के क्षेत्र में श्रेष्ठतम सेवाएँ देकर हमारे देश की प्रतिभावान् छवि को और उजला कर रही है। यही वजह है कि बिल और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स द्वारा स्थापित चैरिटी फाउंडेशन भारत के विकास में मुक्त हाथों से धन और तकनीकी सेवाएँ उपलब्ध करवा रही है।

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स के बारे में पिछले दस साल से मशहूर हैङ्त

  • वे हर सेकंड में 250 डॉलर, हर दिन में 2 करोड़ डॉलर और हर साल में करीब 8 अरब डॉलर कमाते थे ।
  • यदि उनसे 1 हजार डॉलर गलती से गिर जाएँ तो उन्हें उठाने की जरूरत नहीं, क्योंकि उठाने में लगे 4 सेकंड में वह उतना फिर कमा लेते थे ।
  • यदि उनके पूरे धन को 1 डॉलर के नोट में बदल दिया जाए तो उससे धरती और चाँद के बीच 14 बार सड़क बनाई जा सकती है। हाँ, इसे बनाने में करीब 1400 साल का समय लगेगा और नोटों को ढोने में लगेंगे कुल 713 जंबो बोइंग विमान
  • यदि बिल गेट्स एक देश का नाम होता तो वह दुनिया का 37वाँ अमीर देश होता
  • उनके पास इतना धन था कि वे धरती के हर इनसान को 15 डॉलर दान में दे

दें तो भी उनके पास 50 लाख डॉलर बचे रहेंगे ।

  • अमेरिका के सर्वाधिक धनी एथलीट कहे जानेवाले माइकल जॉर्डन को बिल गेट्स के बराबर आने में करीब 277 साल लगेंगे।

वस्तुतः बिल गेट्स ने इतना पैसा कमाया कि वे अगले 25 साल और जीवित रहते हैं औरे वह हर दिन 70 लाख डॉलर भी खर्च करें तो भी पूरी संपत्ति खत्म नहीं होगी।

An American engineer Richard Drew saw two autobody painters struggle to make a clean dividing line on two colour paint jobs. Drew’s ingenious solution for the painter’s dilemma was the world’s first masking tape. The Scotch Cellulose Tape ( as we know it cello tape today) finds a place in every self-respecting home and office in the world. So the next time you are in a sticky situation, do not look for an easy way out.

Look for a solution ! THINK SOLUTIONS !

In a sticky situation ? 

Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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